Wednesday, 18 February, 2009

पहला, दूसरा..तीसरा..चौथा..पांचवा..और छठा लगातार बोल रहा है

उफ! हाय! अरे-अरे! नहीं-नहीं! बाप रे! गजब! हें..हें!...ये ऐसे उदागार हैं...जो दो दिन से ब्लागर्स के मुख से निकल रहे हैं। लिखित और मौखिक ये शोर इतना बढ़ गया है कि अगर अंग्रेजों ने सुन लिया होता तो 1947 से पहले ही ये देश छोड़कर भाग खड़े होते।


एक ने कहा...वह ऐसा कर सकता है।
दूसरे ने कहा--यकीन नहीं होता।
तीसरे ने कहा..ये साजिश है।
चौथे ने कहा...असीम संभावनाओं वाला एक शख्स ऐसा कैसे कर सकता है?
पांचवे ने कहा...ऐसा वह पहले भी कर चुका है।
छठा...जो उसके कुल गोत्र से परिचित था...अखबार के दफ्तरों से झाड़-पोंछ कर कुछ उदाहरण ले आया...। फिर सबको बताया कि देखो-देखो पहले भी वह क्या-क्या गुल खिला चुका है।
तब फिर वह खुद सामने आया। जिद्दी दाग की तरह बैठ गए इल्जामों पर अपनी बात कहते हुए..। लेकिन जो होना था वही हुआ...किसी ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया....क्योंकि उस बात को कहने में जितनी भूदानी विनम्रता घोली गई थी....उसमें उसका सच भी घुल गया।..
फिर बढ़ा शोर....पहले, दूसरे..तीसरे..चौथे..पांचवे..और छठे ने मोर्चा संभाला,एक साथ छह पोस्ट नजर आए। साथ ही शुरू हुआ भांति-भाति के उदगार।
उफ! हाय! .अरे-अरे! नहीं-नहीं!....बाप रे.!..गजब.!..हें..हें!...ये ऐसे उदागार हैं...जो दो दिन से ब्लागर्स के मुख से निकल रहे हैं। लिखित और मौखिक ये शोर इतना बढ़ गया है कि अगर अंग्रेजों ने सुन लिया होता तो 1947 से पहले ही ये देश छोड़कर भाग खड़े होते।
एक इल्जाम का सच ब्लागर्स के शोर में भटक गया। जिसने इल्जाम लगाया...उसके बारे में बहुतों को नहीं पता...लेकिन इल्जाम जिसपर लगा था...वह सामने था...तो जाहिर है निशाने पर वही था। किसी का गुनाह सिर्फ इस बात पर तो साबित नहीं हो सकता कि किसी ने उसपर इल्जाम लगाएं हैं? एक ब्लॉगर ने फिलासफी का पहला अध्याय दे मारा...कि जहां आग होती है वहीं धुआं उठता है। अब वहां आग थी कि नहीं, ये नहीं पता...लेकिन धुएँ को जिस ढंग से हवा दी जा रही है...उससे आग क्या ज्लामुखी फट सकती है....। बात इल्जाम और उसके सच से शुरु हुई थी...हम इतने उत्साही थे कि इतिहास उठा लाए...फिर नारीवादी..और पुरूषवादी मानसिकता के खांचे में बहस को ठोंक कर बैठ गए....।
शोर अब भी जारी है।
उदगार अब भी निकल रहे हैं।
पहला, दूसरा..तीसरा..चौथा..पांचवा..और छठा लगातार बोल रहा है। फिलहाल वे चुप भी नहीं होने वाले..और सातवें को आप पढ़ ही रहे हैं।
लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि इस पूरे मामले में वो नहीं बोला...जिसके बोलने और लिखने का इंतजार कर रहे थे सब। वो चुप है। उसके ब्लॉग पर बहस नहीं...कविता है। अब सच क्या है...कौन जाने। कम से कम मैं तो नहीं जानता...लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि ये बहस बेसिर-पैर की है।

-देव प्रकाश चौधरी

Saturday, 14 February, 2009

वेलेंटाइन डे पर ये भी खूब रही--Black & White Love Story

पेड़ की छांव में प्यार को खिलते देखना और बात है...और पेड़ की फुनगी पर बैठकर प्यार को महसूस करना और। आप भी पढिए ये लव स्टोरी और बताइये क्या ये प्यार नही...? अगर नहीं तो फिर ये क्या है?


ONE
एक शाम गुल पेड़ की शाख पर बैठकर बसंत का आनंद ले रहा था। बगल में बुलबुल भी थी।बसंती हवा ने गुल को कुछ अधिक ही चंचल बना दिया था, लेकिन बुलबुल को उसकी चुहलबाजी रास नहीं आ रही थी।
"अचानक उदास क्यों हो गई-?"-गुल के स्वर में ओढ़ा हुआ दुलार था।
"तुम नहीं समझोगे, पुरुष प्रकृति के हो न?"- बुलबुल की आवाज नम थी.
"आखिर क्या हुआ?" अधीर होकर गुल ने पूछा।
बुलबुल ने कहा-"सामने के घर को देख रहे हो न, जहां से धुआं उठ रहा है? वहां जाओ सब कुछ समझ में आ जाएगा।"
"अभी आया"- कहकर गीत गाता हुआ गुल उड़ गया।
कुछ ही क्षणों में जब वो वापस लौटा तो उसका मन खीझा हुआ था-"वहां कुछ तो गड़बड़ नहीं है। पति दो बरस बाद परदेस से लौटा है। घर में उत्सव का माहौल है। पकवान बन रहे हैं । महीनों बाद पत्नी के पायल की आवाज सुनाई पड़ रही है। सुनदर कपडों में सज-धज कर वह पूरे घर में चहक रही है। ऐसे में उदास होने का कारण क्या है?"आखिरकार गुल अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाया।

"पत्नी की खुशी से ही तो मैं उदास हूं।उसका पति कल ही फिर वापस परदेस चला जाएगा।"-कहकर बुलबुल एक बार फिर उदास हो गई।

TWO

एक लंबी उड़ान के बाद गुल वापस आया। बुबुल तिनके बटोर रही थी।
अचानक गुल ने पूछा-"ताड़ के पेड़ से सटे घर में एकदम सन्नाटा क्यों है बुल?"
बुलबुल ने घोंसले में अंतिम तिनका जोड़ते हुए कहा-"खखरू और उसकी माय बगल के शहर में फिल्म देखने गई है। शंकर में शोले लगी है न?"
"ये खखरू की माय को फिल्म देखने का भूत कब से सवार हो गया?" बुल का स्वर आश्चर्य में डूबा हुआ था।
"परदेस से पति की चिट्ठी आई है। इस मंगलवार को वह और खखरू शोले देख ले।यह फिल्म वहां भी लगी है।मंगलवार को कारखाना बंद रहता है न? खखरू का बाप भी वहां देखेगा।" बुलबुल ने जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की..पर गुल और ब्यग्र हो उठा-"ऐसा शौक तो किसी का मैंने नहीं सुना।?"
"यह शौक नहीं लाचारी है गुल। इसी बहाने कुछ घंटे तो पति और पत्नी साथ-साथ रहेंगे"-बोलकर इस बार बुलबुल लंबी उड़ान पर चली गई।
-देव प्रकाश चौधरी

Thursday, 12 February, 2009

गुलाब जहां चूक जाए...वहां जूता चल निकलता है....

बुश पर पड़े जूते 50 करोड़ के हो गए..जिसके थे जूते उनको वेलेंनटाइन डे पर फूल लेकर भटकने की जरूरत नहीं पड़ी...एक सुंदर सुशील और कुलीन घराने की कन्या सहर्ष विवाह के लिए राजी हो गई...जिनके हाथ में गुलाब था वह खिलते-खिलते मुरझा गया...आंखें इंतजार करते करते पथरा गईं...लेकिन जूता उठा तो सोया हुआ मुकद्दर दनाक से उठ कर बैठ गया...।

हर साल इस मौसम में वे गुलाब ढूंढते थे...इस बार जूते के पीछे पड़े हैं। जूता पहनकर गुलाब की खोज में निकलते हुए चेहरे पर 'कोलंबसी' भाव होता था...और गुलाब का एक खिलता हुआ फूल लेकर जब वो लौटते थे तो दिल 'दरियागंज' हो जाता था...लेकिन ये क्या अब जूता पहनकर जूते की खोज में निकलते हैं वे। जूता उनके सर चढ़कर बोलने लगा है। सपनों में आने लगे हैं जूते...जूते पर वो महाकाव्य लिखने की सोच रहे हैं...जूता समग्र। जूते को लेकर फिल्म और सीरियल बनाने का भी मन करता है उनका....कई टाइटिल आए हैं दिमाग में...जूता तेरे नाम का... जख्मी जूता...जूता खरीदो सजना...जिसका जूता वही सिकंदर....दीवाना हुआ जूता... जूता 420...कहानी हर जूते की,अजनबी जूते, जब जूते मेट, और टाईटिल्स के उदगम स्थल पर ताला नहीं लगता है तो अक्सर ये सारे टाईटिल्स इनकी आंखों के सामने जूतमपैजार पर उतर आते हैं।
जूते पर सोचते-सोचते उनकी सोच अक्सर भटकने लगती है...पहले ठाकुर के कांटेदार जूते नजरों के सामने आते हैं....और फिर कैटरीना के नुकीले जूते....वे सोचते हैं...ये जूता पैरों में ही क्यों पहनते हैं लोग...सर के लिए क्यो नहीं होते जूते? फिर याद आता है उन्हें उनका पहला जूता....10वीं क्लास में थे...तो पिताजी ने मुंह पर मारे थे जूते । पहनना तो कॉलेज से शुरु किया...वो भी अगर एनसीसी न लिया होता तो सैंडल से ही काम चल जाता...लेकिन तब का जूता और अब के जूते में फर्क है।.तब मेरा जूता है जापानी का जमाना था...और अब....जूते से उनको जमाना है....। उनका मानना है गुलाब जहां चूक जाए...वहां जूता चल निकलता है....बुश पर पड़े जूते 50 करोड़ के हो गए..जिसके थे जूते उनको वेलेंनटाइन डे पर फूल लेकर भटकने की जरूरत नहीं पड़ी...एक सुंदर सुशील और कुलीन घराने की कन्या सहर्ष विवाह के लिए राजी हो गई...गुलाब खिलते-खिलते मुरझा गया...आंखें इंतजार करते करते पथरा गईं...लेकिन जूता उठा तो सोया हुआ मुकद्दर दनाक से उठ कर बैठ गया...। जिसका था जूता -वो जमाने के लिए सिकंदर हो गया।
वे सोचते हैं...गुलाब ने क्या दिया है अब तक?....ताने...इंतजार....तंग गलियां...और एक किस्म का तिलिस्म जो चंद्रकात संतति की तरह शुरु हुआ है तो खत्म ही नहीं हुआ...और जूता? जूता बहुत कुछ दे सकता है। खड़ाउं का जमाना था तो राम खड़ाउं पहनते थे और भरत को बैठे-बिठाए मिल गया था खड़ाउं सरकार...राम जूता पहनते तो वो जूता सरकार हो जाता....उन्हं लगता है चाहे प्रेम पाना हो या सरकार...जूता ही लगाएगा बेड़ा पार...जूता ही सरकार है समाजवाद इस देश में जूते पर चलकर आया....कम्युनिस्ट के जूते घिस गए...सरकार तक नहीं पहुंच पाए....जूते को घिसने नहीं देते...तो सरकार चलाते...। उन्हें लगता है कि जूते पर सोचते सोचते वे चिंतक हो जाएंगे....और लोग उन्हें कहेंगे वरिष्ठ जूता चिंतक...। लेकिन उनकी चिंता तो ये है कि उनके जूते कैसे जम जाएं...चलें तो सरकार की तरफ...मुड़े तो कार की तरफ......गुलाब ने अब तक उन्हें गम ही दिया है...और कई महीने तक दिन में भी 'गमकते'रहे है.वे.. अब जूते चलेंगे....और इस वेलेंटाइन डे पर तो जरूर चलेंगे...जूते में खिलेंगे गुलाब। प्रेमचंद के फटे जूते थे,एक पूरी पीढ़ी वेलेंटाइन डे से चूक गई...एक फटे जूते ने हजारों नौजवानों को प्यार के अनमोल अहसास से वंचित कर दिया, लेकिन ये जमाना तो एक से बढ़कर एक जूतों का है...ये देखिए हैदराबादू जूते, ये नागपूरी, ये इलाहाबादी और ये...ये तो एक प्रख्यात डिजायनर ने हीरो के लिए बनाया है...आप बी खरीद सकते हैं। वे सोचते हैं इस वेलेंटाइन पर कोई जूता खरीद ही लिया जाए...और कुंवर बेचन से क्षमा याचना सहित कहा जाय----"जितनी दूर जूता अपने पांव से, उतनी दूर प्रिये तुम मेरे गांव से।"
-देव प्रकाश चौधरी

Sunday, 8 February, 2009

"...तो जनाब पहले आप अखबार उठाइए और प्रिंट लाइन खोजना शुरू कीजिए"-अजीत अंजुम


आपको एक चुनौती देता हूं। आप किसी भी दिन का नवभारत टाइम्स उठाइए। पहले तो खोजिए कि इस अखबार में प्रिंट लाइन कहां है। फिर खोजिए उस प्रिंट लाइन में नवभारत टाइम्स के संपादक का नाम। आपको लग सकता है कि भला ये क्या बात हुई। तो जनाब पहले आप अखबार उठाइए और प्रिंट लाइन खोजना शुरू कीजिए ..... आपको समझ में आ जाएगा कि मैं कहना क्या चाहता हूं।
दरअसल आज सुबह तमाम अखबारों के पन्ने पलटते वक्त अचानक मन में आया कि देखें इन दिनों अखबारों में कैसे और कहां प्रिंट लाइन (जहां प्रकाशक और संपादक के नाम होते हैं) छप रहा है। सबसे पहले मैंने उठाया नवभारत टाइम्स। खोजनी शुरू की प्रिंट लाइन। इतना तो पता था कि नवभारत टाइम्स में दो कार्यकारी संपादक हैं -मधुसूदन आनंद और रामकृपाल सिंह। इन दोनों संपादकों के नाम खोजने के लिए नवभारत टाइम्स के हर पन्ने को दो-दो, तीन-तीन बार पलटा। नहीं मिला। फिर कोशिश की तो अखबार के आठवें पन्ने पर सबसे नीचे कोने में कुछ छपा हुआ सा दिखा। बेहद सूक्ष्म। इतना सूक्ष्म कि कुछ पता नहीं चल रहा था कि छपा क्या है। दो महीने पहले ही मुझे चश्मा पहनने की जरूरत महसूस हुई थी। आंखों के डॉक्टर की सलाह के बाद मैंने नजदीक का चश्मा पहनना शुरू किया। आज मुझे महसूस हुआ कि मुझे फिर से अपने चश्मे का नंबर बढ़ाने की जरूरत है (कह नहीं सकता ऐसा कोई चश्मा बन पाएगा, जिसे पहनने के बाद मैं आसानी से नवभारत टाइम्स के संपादकों मधुसूदन आनंद और रामकृपाल सिंह का नाम खोज पाऊंगा)।
अखबार के जिस कोने में प्रिंट लाइन जैसा कुछ छपा हुआ दिखा रहा था, उस कोने को मोड़कर हर एंगल से आंखों के नजदीक ले जाकर पढ़ने की कोशिश की और इसी नतीजे पर पहुंचा कि यही है प्रिंट लाइन। बहुत जद्दोजहद के बाद मैंने नवभारत टाइम्स में प्रिंट लाइन तो खोज निकाला, लेकिन अखबार में काम करने वाले दो-तीन साथियों से फोन पर पूछने के बाद पता चला कि दुनिया के शायद सबसे सूक्ष्मतर फॉन्ट में है ये प्रिंट लाइन। खोजने पर संपादकों के नाम भी नजर आ गए। देश के दो वरिष्ठ हिन्दी पत्रकारों का नाम इतने छोटे (सुनहरे नहीं) अक्षरों में लिखा था। समझ में नहीं आया कि इतने बड़े और प्रतिष्ठित अखबार के इतने नामचीन संपादकों के नाम इतने छोटे फॉन्ट में क्यों छपे हैं? क्या अखबार के प्रबंधन की कोई ऐसी मजबूरी है कि संपादक का नाम इससे बड़ा नहीं छाप सकता या फिर नाम छापने की मजबूरी है इसलिए खानापूर्ति कर रहा है। मेरे विचार से ये एक खानापूर्ति की तरह है।
अखबार के संपादकों के नाम के साथ स्टार का एक मार्क भी लगा होता है। स्टार मार्क का मतलब भी प्रिंट लाइन में छपा होता है- पीआरबी अधिनयम के तहत खबरों के चयन और संपादन के लिए जिम्मेवार। मतलब ये कि अगर किसी खबर पर बवाल-बवंडर हुआ तो संपादक जिम्मेवार। केस-मुकदमा हुआ तो संपादक जिम्मेवार। कोर्ट में संपादक के बदले मालिकों को न जाना पड़े, इसकी व्यवस्था इसी प्रिंट लाइन में कर दी जाती है। लेकिन अगर संपादक ही जिम्मेवार हैं (जो कि हैं और होना भी चाहिए) तो फिर उनके नाम को इतना सूक्ष्म क्यों छापा जाता है, जिसे नंगी आंखों से पढ़ना लगभग नामुमकिन है। क्यों संपादक को प्रिंट लाइन में वो सम्मान हासिल नहीं है, जिसके वो हकदार हैं (ये मेरी राय है, हो सकता है संपादक इससे इत्तेफाक न रखें)।
नवभारत टाइम्स के बाद मैंने इसी ग्रुप के इकोनामिक टाइम्स में प्रिंट लाइन खोजनी शुरू की। वहां भी वही मशक्कत। 12 वें पेज पर उतनी ही सूक्ष्म प्रिंट लाइन। पढ़ने में वही परेशानी। संपादक का नाम नदारद सा लगा। जब अपने चश्मे और अपनी आंखों का इम्तिहान लेते हुए चार लाइन का पूरा मजमून पढ़ गया तो बीच में एक जगह छपा था - एडिटर (दिल्ली मार्केट) टीके अरुण। समझने में फिर वही मुश्किल कि अखबार में संपादक का नाम इतना छिपाकर क्यों।
अब आइए टाइम्स आफ इंडिया पर। 26 पन्नों के रविवारी संस्करण (मुख्य अखबार) के हर पन्ने को कम से कम पांच बार स्कैन किया। पेज नंबर 8-9 -10 -11 पर छपे लेखों के नीचे -ऊपर, बीच में, हर जगह प्रिंट लाइन खोजने का प्रयास किया। नहीं मिला। तब लगा फिर मेरे खोजने और चश्मे का कोई मामला है। या फिर दुनिया के किसी ऐसे फॉन्ट में छपी प्रिंट लाइन का मामला है, जो मुझे दिख नहीं रहा है। मैंने फ्रेंड और फोन की लाइफ लाइन इस्तेमाल करने का फैसला किया। अपने न्यज 24 के दफ्तर में असाइनमेंट डेस्क पर रिसर्च टीम के शिफ्ट इंचार्ज और सीनियर प्रोड्यूसर रमेश तिवारी को फोन किया। उनसे कहा कि मुझे टाइम्स आफ इंडिया के किस पन्ने पर प्रिंट लाइन छपी है, जरा खोज कर बता दें। दस मिनट बाद रमेश तिवारी का फोन आया ...टाइम्स आफ इंडिया में प्रिंट लाइन तो नहीं दिख रही है, दिल्ली टाइम्स के आखिरी पेज पर एक कोने में है, आप देख लीजिए। दिल्ली टाइम्स देखने पर मुझे प्रिंट लाइन में दिखा एडीटर (दिल्ली मार्केट) अंशुल चतुर्वेदी।
मेरे सहयोगी से दरअसल चूक हुई थी। टाइम्स आफ इंडिया में प्रिंट लाइन नहीं खोज पाए। मैं इतना तो जानता था कि टाइम्स आफ इंडिया के संपादक अरिंदम सेन गुप्ता हैं, इसलिए उनका नाम अखबार में खोजने के लिए मैं फिर अखबार पलटने में जुटा। पेज नम्बर छह पर स्वर्गीय हो चुके एक बिजनेसमैन को श्रद्धांजलि देने का विज्ञापन छपा था। उसी के नीचे उसी तरह बेहद छोटे फॉन्ट में मुझे दिख गयी प्रिंट लाइन। चार लाइनों के बीच में छपा था -एडिटर (दिल्ली मार्केट) रश्मि रोशन लाल। फिर मेरा माथा ठनका। अरिंदम सेन गुप्ता का नाम कहां है?
मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ साथी को फोन किया ये जानने के लिए कि क्या टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंट लाइन में संपादक का नाम नहीं छपता है? जवाब सुनकर चौंका जब उन्होंने कहा अखबार चेक करके बताता हूं। कुछ देर बाद उनका फोन आया तो पता चला कि टाइम्स आफ इंडिया के रविवारीय संस्करण की संपादक तो रश्मि रोशन हैं, बाकी दिन उनकी जगह विकास सिंह का नाम छपता है। यानि टाइम्स आफ इंडिया के किसी ग्रुप एडिटर या कार्यकारी संपादक का नाम प्रिंट लाइन में नहीं छपता है। दिल्ली मार्केट के संपादक (स्थानीय संपादक) का नाम सूक्ष्म रूप से छपता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया वही अखबार है, जिसके संपादक शाम लाल और गिरिलाल जैन हुआ करते थे। इनके नाम से ही अखबार जाना जाता था। एक समय वो भी था, जब इन्हें लार्जर दैन इन्स्टीट्यूशन कहा जाता था। गिरिलाल जैन के जमाने में उनका कद इतना बड़ा हुआ करता था कि लोग उनके बारे में कहते थे कि देश को दो ही लोग चलाते हैं- प्राइम मिनिस्टर आफ इंडिया या एडिटर टाइम्स आफ इंडिया! कहने का मतलब उन दिनों संपादक बहुत बड़ा ओहदा हुआ करता था। शायद ये भी एक वजह थी, जब कई संस्थानों ने संपादकों के बढ़ते कद को थामने के लिए नए तरीके खोजे। तर्क दिया गया संस्थान बड़ा होता है, व्यक्ति नहीं।
मैंने दैनिक जागरण में प्रिंट लाइन तो आसानी से खोज निकाली, लेकिन यहां मालिकों की तीन पीढ़ियों के नाम छपे हैं। संस्थापक- स्व.पूर्णचंन्द्र गुप्त, पूर्व प्रधान संपादक- स्व.नरेन्द्र मोहन गुप्त, संपादक- संजय गुप्त। जाहिर है श्री संजय गुप्त के नीचे कोई स्थानीय संपादक भी होगा, लेकिन शायद वर्किंग संपादक (जो मालिक न हो) का नाम देना इस संस्थान की नीतियों के खिलाफ हो। दैनिक जागरण के मास्ट हेड के ऊपर छपा है- विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार। सर्कुलेशन के मामले में दैनिक जागरण सबसे बड़ा अखबार है (उनका दावा है), लेकिन आप इस अखबार के पीछे काम करने वाले किसी वर्किंग एडिटर का नाम नहीं जान सकते। सारा श्रेय संजय गुप्त को देना होगा, जो मालिक भी हैं। दिल्ली से बाहर के संस्करणों के बारे में मेरे पास अभी पक्की जानकारी नहीं है, इसलिए उसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं। इतना पता है कि कई रीजनल अखबार मैनेजरों को संपादक बना रहे हैं। जो अखबार का असली संपादक होता है, वो गुमनाम होता है और जो मालिकों के मैनेजर होते हैं, उनके नाम प्रिंट लाइन में संपादक के तौर पर छपते हैं। ऐसे अखबारों में संपादक मैनेजरों के नाम से अग्रलेख भी लिखते हैं।
अमर उजाला में भी पहले सिर्फ वर्तमान मालिकों और उनके स्वर्गीय हो चुके पूर्वजों के नाम प्रिंट लाइन में छपते थे। संस्थापक के रूप में स्वर्गीय डोरीलाल अग्रवाल और स्व. मुरारीलाल माहेश्वरी। संपादकों के तौर पर अजय अग्रवाल, अशोक अग्रवाल, अतुल माहेश्वरी, राजुल माहेश्वरी के नाम (जितना मुझे याद है) अलग-अलग संस्करणों में छपते थे। अब वहां शशि शेखर का नाम संपादक के तौर पर छपता है। शायद इसकी शुरुआत राजेश रपरिया के समय हुई थी, लेकिन शशि शेखर ने वर्किंग संपादक का नाम छापने और उन्हें श्रेय देने का सिलसिला शुरू किया। मेरी जानकारी के मुताबिक अमर उजाला के ज्यादातर संस्करणों में वहां के स्थानीय संपादक के नाम छपते हैं और कायदे से छपते हैं। खुद शशि शेखर अपने अखबार में जमकर लिखते भी हैं। जब लिखते हैं तो उनके तेवर की चर्चा भी होती है, लेकिन यहां की पॉलिसी में एक पेच है। अमर उजाला में छपने वाले उनके लेखों के नीचे लिखा होता है- लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं। कई बार समझने की कोशिश की, इसका मतलब क्या है, फिर लगा कि हो सकता है इसके पीछे कोई सकारात्मक सोच हो या फिर पॉलिसी, जो मुझे समझ में नहीं आ रही है।
दिल्ली के अखबारों में जनसत्ता, दैनिक हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भास्कर और नई दुनिया में प्रिंट लाइन आप आसानी से खोज सकते हैं। नई दुनिया इस मामले में बहुत उदार है या कहें कि हो गया है। आलोक मेहता का नाम बहुत प्रमुखता से प्रिंट लाइन में है। संपादकीय मामलों में मालिकों की छत्रछाया में पले बढ़े होने के बावजूद (मालिकों की तीन पीढियां इस अखबार से भी जुड़ी हैं) संपादक की छाप यहां दिखती है। मालिक होकर भी विनय छजलानी प्रिट लाइन में हावी नहीं है ।
सवाल ये है कि आखिर प्रिंट लाइन इतनी सिकुड़ती क्यों जा रही है? बीस साल पहले जिन बड़े अखबारों में बहुत प्रमुखता से संपादक के नाम छपते थे, वहां अब उनके नाम क्यों इतने सूक्ष्म हो गए हैं? क्या संपादक की जो सत्ता पहले थी, वो आज भी उसी तरह कायम है? बाकी अखबार के प्रिंट लाइन में छपा होता है फलां द्वारा प्रकाशित और मुद्रित। टाइम्स आफ इंडिया और इकोनॉमिक टाइम्स में इस सूचना के साथ यह भी छपा होता है- मेड इन न्यू देल्ही। गौर करिए शब्दों पर- मेड इन न्यू देल्ही।
स्थानीय संपादक के नाम के साथ लिखा होता है- दिल्ली मार्केट।संस्करण यहां मार्केट है और अखबार प्रोडक्ट- मेड इन न्यू देल्ही।
संस्थानों की इस फिलासफी पर विवाद खड़ा करने का हमारा कोई मकसद नहीं है, सिर्फ इस ओर इशारा करना चाहता हूं कि हर अखबार के संपादकों को उसका पूरा श्रेय उसके प्रिंट लाइन में क्यों नहीं मिलता है। अखबार का विस्तार हो रहा है तो फिर संपादक के कद पर लगाम क्यों। संपादक नाम की संस्था को उतना तवज्जों क्यों नहीं दिया जा रहा है, जितना दिया जाना चाहिए। कई रीजनल अखबारों में पहले मालिकों के नाम पहले स्वामित्व, प्रकाशक और मुद्रक में छपते थे, अब उनके नाम संपादक के तौर पर छपते हैं और संपादक के नाम गायब हो गए हैं।
बेशक अखबार कोई प्रोफेशनल पत्रकार चलाता हो, बेशक अपने अखबार मालिक के नाम पर अग्रलेख कोई स्थानीय संपादक लिखता हो, लेकिन संपादक प्रिंट लाइन में अपना नाम देखने के लिए तरसता रह जाता है।

लेखक अजीत अंजुम वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों हिंदी न्यूज चैनल 'न्यूज 24' के मैनेजिंग एडिटर हैं। इस आलेख पर अपनी राय, टिप्पणी या प्रतिक्रिया लेखक तक पहुंचाने के लिए आप ajitanjum@bagnetwork.in का सहारा ले सकते हैं। अजित अंजुम का ये लेख भड़ास 4 मीडिया पर रविवार को प्रकाशित हुआ है...।

Monday, 2 February, 2009

ब्लागर्स को कैसे-कैसे दुख? दवा नहीं के बराबर

ऋषि-मुनियों ने दुख के जितने प्रकार गिनाए हैं,उसमें ब्लागर्स का दुख शामिल नहीं है। महाभारत काल के दुख अलग थे...दशरथ काल के अलग और ये मनमोहन काल है।आज का दुख सबसे अलग। शायद ब्यास जी को भी इस बात का आभास नहीं था कि आने वाले काल में लोग ब्लॉग लिखेंगे और लिखते-लिखते दुखी होंगे।

पौराणिक वचन है कि एक छोटा सा तिनका भी बड़ा दुख दे सकता है, लेकिन सिर्फ तिनका हों तो उसे सहारा बनाकर कई ब्लागर्स खुद को दुख के सागर में डुबने से बचा ले..लेकिन यहां तो दुख की वजह क्लिक है, टिप्पणी है, अपने लिखे का दूसरों के न पढ़ने का मलाल है और दूसरे के ब्लॉग पर बढते क्लिक- वहां होती चर्चाओं के बाद छाती पर लोटते सांपों का हाहाकार है...इसलिए ये दुख अलग है...दवा नहीं के बराबर है।
हुलसकर अपने ब्लॉग पर हर रोज लिख मार देने वाला ब्लॉगर जब एक घंटे के बाद ब्लॉगवाणी पर पहुंचता है तो मायूस हो जाता है। मात्र 11 क्लिक, टिप्पणी एक भी नहीं। करे ते क्या करे? उसे पता है कि 11 में 3 क्लिक तो उसका खुद का है,दो पत्नी ने किए होंगे...और एक दोस्त ने। उसकी मायूसी तब और बढ़ जाती है, जब वह देखता है कि उसके बाद किए गए पोस्ट में 9 टिप्पणियां. क्लिक 73, पसंद में सबसे उपर। वो फौरन उस ब्लॉग पर पहुंचता है और वहां के माहौल को देखकर लहुलुहान हो जाता है। कौन है ये ब्लॉगर...? अरे प्रोफाइल में भी अपने बारे में कुछ नहीं लिखा? कोई अनाम है क्या? अनाम रहकर कोई ब्लॉग-ब्लॉग कैसे खेल सकता है? ये तो गलत है, लेकिन करे तो क्या करे? बॉस से नजरें बचाकर वो फिर ब्लॉगवाणी पर पहुंचता है...लेकिन पसंद में सबसे उपर, सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले ब्लॉग का कोई कुल-गोत्र उसे नहीं

क्लिक ज्यादा हो इसकी तरकीब चाहिए उसे। उसे "सविता भाभी" याद आती है...लेकिन फिर उसे याद आता है कि सविता भाभी तो किसी और ब्लॉग पर बैठी है। वो जाति के बारे लिखने की सोचता है, लेकिन जमता नहीं। सेक्स पर उसकी सोच अक्सर भटक जाती है। उसकी कविता कोई पढ़ता नहीं।

मिलता। उसके अंदर छिपा बुद्धिजीवी उसे धिक्कारता है और वह मुंह लटकाए बैग समेटे घर लौट आता है...पत्नी फौरन ताड़ जाती है कि चेहरे पर दिखने वाले बारह के पीछे बॉस की फटकार नहीं, बढ़ते काम का बोझ नहीं...ब्लॉग पर ज्यादा क्लिक न हो पाने का हाहाकार है...वो किचन से बाहर ही नहीं निकलती। इधर 21वीं शताब्दी का वह महान ब्लॉगर सोचता है...क्लिक ज्यादा हो इसकी तरकीब चाहिए उसे। उसे "सविता भाभी" याद आती है...लेकिन फिर उसे याद आता है कि सविता भाभी तो किसी और ब्लॉग पर बैठी है। वो जाति के बारे लिखने की सोचता है, लेकिन जमता नहीं। सेक्स पर उसकी सोच अक्सर भटक जाती है। कविता कोई पढ़ता नहीं। उसके लिखे बड़े-बड़े लेखों ने अब तक उसे 'बुद्धजीवी' का दर्जा तो दिलवा दिया लेकिन कभी ज्यादा क्लिक नहीं दिलवा पाया। क्या करे वो....तभी उसे याद आता है ब्लॉग का महारथी। कई बार उस महारथी ने भी उससे सलाह ली है...आज वो सलाह लेना चाहता है...एक समंदर ने आवाज दी, मुझे पानी पिला दिजिए। फोन पहली बार ही लग गया। महान ब्लॉगर ने अपनी सारी मायूसी अपने भूदानी वचनों में घोलकर महारथी के कानों में डाल दी-" कोई बिना सामने आए ब्लॉग कैसे चला सकता है? ये नैतिकता के खिलाफ है...उस ब्लॉग पर बहस हो रही है और वो ब्लॉगर नकाब ओढ़े क्यों बैठा है? " महारथी को ये समस्या तालिबान से कम नहीं लगी...फिर भी वो महारथी था। एक फार्मूला दे दिया। थोड़ी देर बाद उसके ब्लॉग पर एक पोस्ट नजर आया...उस पोस्ट में नैतिकता की बात थी... ज्यादा पढ़े जाने वाले ब्लॉग के ब्लॉगर को नसीहत थी-'सामने आओ...पीछे छुपकर अऩाम रहकर क्यों कहते हो अपनी बात। दम है तो चेहरा दिखाओ। हेडिंग भी ऐसी थी कि लोग फौरन लपक पड़े...ऐसा लगा मानो उसने ब्लॉगर्स के बीच युद्ध का ऐलान कर दिया हो..'
महारथी का फार्मूला काम कर गया। उसे हिट मिल गए। उसका दुख कम हुआ। पहली बार वो ब्लॉगवाणी पर कुछ उपर था।
-देव प्रकाश चौधरी

Friday, 23 January, 2009

अब लादेन नहीं कमाएगा तो उसके बेटे उसे मारेंगे


अब लादेन नहीं कमाएगा तो उसके बेटे उसे मारेंगे। उसकी गुफा में मारेंगे...गुफा के बाहर मारेंगे या हो सकता है किसी टीवी कैमरे के सामने भी मारे। जब तक पैसा था..तो सब चुप थे। अब पता चल गया है कि बुड्ढा कंगाल है। अब किसको-किसको रोकेगा लादेन? इतने बच्चे हैं...सब मांगेगे हिसाब.?जवाब दो कहां दिए सारे रुपए? कहां छुपाया है बोलो? जनरल साहब चंदे में लाखों दे गए थे..कहां गया? शेख साहब ने भी भिजवाया था..कहां गया...? एक तो पिछले कई सालों से कुछ करते-धरते नहीं और उपर से ले आए कंगाली,बताओ क्या होगा घर का। तुम्हारा भी खर्चा कम है क्या? अब तो लगता है लद गए दिन तुम्हारे। अमेरिका ठीक ही कहता है।
अब लादेन चीख भी नहीं सकता..घर का मामला है। घर में होगा घमासान...तो बाहर वाले क्या सोचेंगे? तो क्या करेगा लादेन? लादेन अपने बच्चों को अपनी कहानी सुनाएगा.....लादेन कहेगा....मेरी कहानी को बेचो...बहुत माल मिलेगा। इस बात पर हो सकता है लादेन के बेटे एक बार फिर भड़क जाएं और एक-दो चांटा रसीद कर दें कि बताओ...तुम्हारी कहानी में किसको दिलचस्पी है कि वो बिकेगा? तब लादेन अपने बेटों को एक राज की बात बताएगा....मेरी कहानी कहीं बिके या न बिके....मुंमबइया फिल्म इंडस्ट्री में तो जरूर बिक जाएगी या कोई टीवी चैनल तो जरूर खरीद ले्गा...लेकिन इससे शायद लादेन के बेटे को संतोष नहीं होगा....उन्हें आतंक की कहानी नहीं...पैसा चाहिए। वो अगर बाप के बेटे होंगे तो कतई नहीं मानेंगे ये बात...वो फिर भड़केंगे...बाप को मारेंगे...तमाशा खड़ा करेंगे...और अपने बाप से कहेंगे...जाओ...जनरल साहब के पास। रोओ या गाओ..लेकर आओ पैसा..जैसे भी हो लेकर आओ...। अभी तुम्हारा क्रेडिट इतना खराब नहीं हुआ है कि लोग चंदा भी न दे...कुछ भी हो...अपने जीते-जी ये कंगाली दूर कर जाओ...हो सकता है इस बार लादेन मान ले उनकी बात और निकल जाए अपनी गुफा से।

Thursday, 22 January, 2009

मंदी किसी लड़की का नाम होता.....तो क्या होता?


हे ब्लागर्स! क्या मंदी मंद-मंद मुस्कुराती है? अखबारों में, सेमिनारों में ,टीवी में,आईटी कंपनियों में ,बड़े बड़े बिजिनस घरानों में मंदी दिखती है, मंदी की मार दिखती है, दहाड़ दिखती है, लकिन मंदी का चेहरा नहीं दिखता।कहते हैं सात समंदर पार से आई है मंदी, लेकिन वह दिखती क्यों नहीं?अगर दिखती तो मैं सबसे पहले उसका चेहरा देखता और फिर पूछता-"हे मंदी देवी!...तुम आ ही गई हो तो इतना बता जाओ कि जाओगे कब?" मेरा एक दोस्त कहता है..."मंदी दिखती नहीं...सिर्फ आप उसे महसूस कर सकते हैं। वह सुक्ष्म है। वह अगोचर है। वह निराकार है।" अरे...अरे ये लक्षण तो देवी-देवताओं के हैं...तो क्या मंदी सचमुच कोई देवी है?
मेरा दोस्त कहता है ये सब तुम सोचो। आप भी सोचिए...कौन है मंदी और किसकी है देवी? मेरे जैसे अर्थशास्त्र के नौसिखुए विद्यार्थी को तो पहली नजर में यही लगा था कि मंदी किसी लड़की का नाम है। वह अमेरिका से आई है। दो-तीन सेमिनारों में हिस्सा लेगी, वित्त मंत्री से हाय-हेलो करेगी...गजनी देखेगी...शाहरूख से मिलेगी...और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिलने का बहाना करके कट लेगी। अगर सचमुच मंदी वही होती, जो मैंने समझा तो कितना अच्छा होता।सभी अखवारों में उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखता। एक-दो ब्लॉग पर भी नजर आती मंदी,लेकिन मंदी वह नहीं। ये मंदी मुस्कुराती नहीं। वह दप्तरों के गुसलखाने से टिश्युपेपर लुटवाने तक पर आमादा है। कॉफी तो बीते दिनों की बात हो गई भईया!
तो हे ब्लागर्स! क्या आप बता सकते हैं मंदी की चाल कितनी तेज है? अमेरिका से चली थी तो कहां-कहां रूकी? कोहरे में उसकी उड़ान रद्द नहीं हुई? क्या गरीब रथ की सवारी करने का मौका मिला उसे? मैं मंदी के बारे में पहले सोच-सोच कर मुस्कुराता था, लेकिन जब से ये पता चला कि मंदी सास-बहू की साजिश से भी खतरनाक है तो मैंने सोचना बंद कर दिया, लेकिन मेरा दोस्त कहता है सोचो? अब आप ही बताइये...मंदी के बारे में मैं क्या सोचूं?यही कि उसे अपने यहां आरक्षण मिला कि नहीं...उसने अपना कोई ब्लॉग बनाया कि नहीं...वो अपना भड़ास कहां निकलती है...क्या मंदी का कोई कस्बा है? मुहल्ला है? क्या क्या है उसके पास?...सोच रहा हूं....आप भी सोचिए।